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Created on - 15 May, 2024
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About Karn In Hindi | जानिए कर्ण के बारे मे हिंदी में

danvir karna

महाभारत के कर्ण के बारे में कई रोचक करने वाली बातें

नमस्कार दोस्तों About Karna, Title पढ़के आपको अंदाजा लग गया होगा की आज हम किस के बारेमें बात करने वाले है, Karna (कर्ण) एक महान योद्धा, दानवीर और महाभारत का एक प्रमुख पात्र, चलिए जानते है इस शूरवीर के जन्म से लेके मुत्यु तक की कहानी, तो चलिए शुरू करते है 

महाभारत के प्रमुख पात्र में से एक, भगवान सूर्य नारायण के पुत्र, भगवान परशुराम के शिष्य और अर्जुन के प्रतिद्वंदी अंगराज कर्ण शूरवीर और बड़े दानवीर थे। 

शुद्ध संकल्प के परिणाम स्वरुप जन्म और लालन -पालन 

महर्षि दुर्वासा ने माता कुंती को उनकी सेवा से प्रसन्न हो कर एक मंत्र वरदान में दिया था, उस मंत्र से वे किसी भी देवता का आहवान करके उनसे पुत्र प्राप्ति कर सकती थी। वरदान की उत्सुकता वश कुंती माता ने विवाह पूर्व ही महर्षि दुर्वासा के दिए मंत्र से भगवान सूर्य नारायण का आहवान किया। इससे भगवान सूर्य नारायण प्रकट हुए और कुंती माता को एक पुत्र दिया। जिसका तेज सूर्य के सामान था , जिसको जन्म से ही कवच - कुण्डल प्राप्त थे। भगवान सूर्य ने उस बच्चे को कर्ण नाम दिया और वो अदृश्य हो गए। विवाह पूर्व बच्चे को पाकर कुंती माता घबरा गई और संसार क्या कहेगा ये सोचकर कर्ण को एक बक्से में रखकर गंगा नदी में बहा दिया। गंगा नदी में बहता हुआ बक्सा गंगापुत्र भीष्म के अश्व सारथि सूत अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिला और कर्ण को उन्होंने गोद ले लिया और उनका लालन पालन करने लगे। अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने कर्ण को वसुषेण नाम दिया। अधिरथ और राधा ने कर्ण को लालन पालन करके बड़ा किया इस लिए कर्ण को ' सूतपुत्र ' और ' राधेय ' भी कहा जाता है। 

 कर्ण का बचपन और प्रशिक्षण  

कर्ण को बचपन से ही रथ चलाने की बजाय युद्ध कला में धनुर्विद्या में बहुत दिलचस्पी थी। कर्ण धनुर्विद्या की शिक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है, जो उस वक्त केवल हस्तिनापुर के कुमारो को ही शिक्षा दे रहे थे। गुरु द्रोणाचार्य ने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया क्योकि वह सूतपुत्र था। आचार्य गुरु द्रोण के मना करने के बावजूद वो निराश नहीं हुआ। कर्ण के मन में एक ही लक्ष था की संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर बनना। अपना संकल्प पूर्ण करने के लिए और अपने लक्ष की पूर्ति हेतु वो भगवान परशुराम के पास शिक्षा के लिए गया। भगवान परशुराम केवल ब्राह्मणो को ही शिक्षा देते थे। कर्ण को भी अपने लक्ष की पूरी करनी थी, तो कर्ण ने अपना सत्य छुपाकर उनको कहा की वो ब्राह्मण है। भगवान परशुराम ने कर्ण का आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में पारंगत किया। 

कर्ण की शिक्षा का अंतिम चरण शुरू हो चूका था। एक दिन भगवान परशुराम कर्ण की जांघ पर शिर रखकर विश्राम कर रहे थे। उस वक्त एक बिच्छू आया और कर्ण की जांघ में डंख लिया। अपने गुरु की निंद्रा भंग न हो इस लिए वो बिच्छू का डंख सहन करता रहा। उसकी जांघ से बहुत रक्त बहने लगा था। जब भगवान परशुराम की निंद्रा पूरी हुई तो उन्होंने ये सब देखा। उनको पता चल गया की एक ब्राह्मण की सहनशीलता इतनी नहीं होती। तब उन्होंने कर्ण को जूठ बोलकर शिक्षा लेने पर श्राप दिया की जब भी कर्ण को उनकी दी गई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उसके काम नहीं आएगी और वह शिक्षा भूल जायेगा। कर्ण ने सत्य बताया की वो सूतपुत्र है और अपनी कहानी बताई। भगवान परशुराम अपना श्राप वापस नहीं ले सकते थे, इस लिए उन्होंने कर्ण को अपना ' विजय धनुष ' दिया और कहा जब तक ये धनुष तुम्हारे हाथ में होगा तुम्हे कोई पराजित नहीं कर सकेगा। फिर कर्ण अपने गुरु को प्रणाम करके वहा से चला जाता है। फिर कर्ण कई जगह पर भटकता रहा और शब्दभेदी बाण चलाने की खुद से विद्या प्राप्त करने लगा। अभ्यास के दौरान कर्ण का बाण एक ब्राह्मण की गाय के बछड़े को लग जाता है। तब वो ब्राह्मण कर्ण को श्राप देता है की जैसे उसने एक निसहाय पशु को मारा है, उसी प्रकार वो भी जब निसहाय होगा और उसका ध्यान दूसरी जगह पर होगा तब उसकी मृत्यु होगी। कुछ कथाओ के अनुसार कहा जाता है की धरतीमाता कर्ण को श्राप देती है की उसके निर्णायक युद्ध में उसके रथ का पहिया धरती में स्थिर हो जायेगा। इस प्रकार कर्ण को दुर्भाग्य वश तीन श्राप मिले। 

कर्ण वापस हस्तिनापुर लौटता है तो उसे पता चलता है गुरु द्रोण के शिष्यों के लिए रंगभूमि का आयोजन किया गया है और उसमे गुरु द्रोण ने अर्जुन को संसार का सबसे अच्छा धनुर्धर कहा है, तब कर्ण रंगभूमि में जाकर अर्जुन को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकार देता है। तब कुलगुरु कृपाचार्य ने कर्ण को अपने वंश के बारे में बताने को कहा और कहा की यह केवल राजकुमारों की प्रतिस्पर्धा थी, और एक राजकुमार को केवल एक राजकुमार या एक राजा ही द्वन्द्वयुद्ध के लिए आहवान दे सकता है। तब ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित कर देता है और कर्ण दुर्योधन को वचन देता है की अब उसकी मृत्यु उसीके लिए होगी। दुर्योधन ने भी कर्ण को अपना सच्चा मित्र मान लिया था। दुर्योधन को भी कर्ण के रूप में अर्जुन का सामने करनेवाला मिल गया था। 

 कर्ण शुरुआत से ही शकुनि को पसंद नहीं करता था। वो दुर्योधन को धर्म के रास्ते चलने का परामर्श देते रहता था। अपने शत्रुओ का सामना युद्ध के कॉशल से कर ने के बारे में दुर्योधन को सजाग करता रहता था। जब लाक्षागृह में पांडवो को जिन्दा जलाने की कोशिश हुई और कर्ण को पता चला तब कर्ण ने दुर्योधन को इस कायरता और कुटिलता के लिए डाटा था। कम्बोज के राजा चित्रांगद की राजकुमारी भानुमति से विवाह करने में भी कर्ण ने दुर्योधन की सहायता की थी। 

कर्ण की शादी और बच्चो के बारे में 

कर्ण की दो पत्नियां थी। एक का नाम वृषाली और दूसरी का नाम सुप्रिया था।कर्ण की पहली पत्नी वृषाली दुर्योधन के रथ के सारथी सत्यसेन की बहन थी। कर्ण और वृषाली के ३ पुत्र थे। उनके नाम है वृषसेन, सुषेण, वृषकेत। कर्ण और उसकी दूसरी पत्नी सुप्रिया के चित्रसेन, सुशर्मा, प्रसेन नामक ३ पुत्र थे।

कर्ण की उदारता और चरित्र 

कर्ण हररोज सूर्यपूजा करता था। पूजा के बाद जो कोई भी उससे कुछ मांगता था तो कारण उसे वो दे देता था। कर्ण किसीको नाराज नहीं करता था। इस लिए कर्ण  को ' दानवीर कर्ण ' भी कहा जाता है। पांचाल नरेश द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के विवाह का स्वयंवर का आयोजन किया गया तब कर्ण भी वहा दुर्योधन, दुशासन और शकुनि के साथ वह उपस्थित था। वहा कोई भी राजा धनुष उठाकर पानी में देखकर ऊपर घूम रही मछली की आँख का छेदन नहीं कर सका था। तब कर्ण मछली की आँख का छेदन करने के लिए जाता है। द्रौपदी को सूतपुत्र से विवाह नहीं करना था इस लिए उस ने कहा की वो सूतपुत्र से विवाह नहीं करेगी। यह सुनकर कर्ण को दुःख होता है। बाद में ब्राह्मण वेश में खड़े अर्जुन ने धनुष उठाकर मत्स्य की आँख का छेदन किया और द्रौपदी से विवाह किया। 

कर्ण की दुर्योधन से मित्रता 

जब हस्तिनापुर पांडवो को हराने के लिए धुत सभा का आयोजन किया गया तब भी कर्ण इसके खिलाफ था। वह पांडवो को छल कपट से नहीं बल्कि युद्ध से हराना चाहता था। फिर भी दुर्योधन को बुरा न लगे इसके किए कर्ण धुत सभा में उपस्थित रहे। पांडव जब १२ साल के वनवास और आखिरी १ साल के अज्ञातवास के लिए निकले तब कर्ण दुर्योधन को पृथ्वी का राजा बनाने और दूसरे राज्यों को हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन के प्रति निष्ठावान बनाने का काम हाथ में ले लिया। फिर कर्ण ने अकेले ही कम्बोज, विदेह, शक, गन्धार, माद्र, त्रिगत, तंगन, केक‍य, अवन्तय, पांचाल, सुह्मस, अंग, वांग, निशाद, कलिंग, वत्स, अशमक, ऋषिक के राजाओ और अन्य कई म्लेच्छ और वनवासी लोगो को हराकर उनको दुर्योधन के प्रति निष्ठावान बनने पर विवश कर दिया।

श्रीकृष्ण जब शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर आते है तब वो दुर्योधन को कहते है की वो पांडवो को अपना राज्य न सही केवल पांच गांव दे दे। तब कर्ण दुर्योधन को यह प्रस्ताव मान्य रखने के बारे में कहता है, पर दुर्योधन कर्ण की बात नहीं मानता। फिर श्री कृष्ण कर्ण को अकेले में मिलते है और कर्ण उसके जीवन का सत्य बताते है की वो कुंती माता का पुत्र है और ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र है, और कहते है की वो पांडवो के पक्ष से युद्ध करे। कर्ण मना कर देते है और कहते है की उन्होंने दुर्योधन को वचन दिया है की वह मरते दम तक दुर्योधन के पक्ष में ही युद्ध करेगा। 

महाभारत का युद्ध होने से पहले कुन्तीमाता कर्ण से मिलने गई थी। कुन्तीमाता कर्ण को कहती है की वो ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र है और वह उनका पुत्र है, और दुर्योधन का संग छोड़कर पांडवो के पक्ष में आ जाए और वह उसे राजा बनाएगें। कर्ण कहता है कि दुर्योधन उसका मित्र है और वो उस पर बहुत विश्वास करता है और वह उससे विश्वासघात नहीं कर सकता। वह कुन्ती माता को ये वचन देता है कि वह अर्जुन के अतिरिक्त किसी और पाण्डव का वध नहीं करेगा। 

महाभारत का युद्ध

महाभारत के १०वे दिन जब पितामह घायल होकर बाण शैया पर लेट जाते तब कर्ण को युद्ध में आने का मौका मिलता है। महाभारत के युद्ध में ११ वे दिन इंद्रदेव को पता चल जाता है की कर्ण युद्ध में आने वाला है, और उसे हराना नामुमकिन है। तब इंद्रदेव ब्राह्मण बनकर कर्ण से कवच और कुण्डल मांगने आनेवाले ये बात सूर्यदेव कर्ण को बता देते है। जब इंद्रदेव कर्ण से ब्राह्मणवेश में कवच कुण्डल मांगने आते है तब कर्ण उन्हें इंद्रदेव कहकर बुलाते है। तब इंद्रदेव अपने असल स्वरूप में आ जाते है। फिर कर्ण उन्हें कवच कुण्डल दे देते है। फिर इंद्रदेव खुश होकर कर्ण को एक वरदान मांगने को कहते है, तब कर्ण ये कहकर मनाकर देते है की ' दान देने के बाद कुछ माँग लेना दान की गरिमा के विरुद्ध हे ' । तब इंद्रदेव कारण को अपना शक्ति अस्त्र वासवी प्रदान करते है और कहते है की वह युद्ध एक बार इस अस्त्र का उपयोग कर सकता है। 

युद्ध के १३ वे दिन कर्ण दुर्योधन, दुशाशन, गुरु द्रोण, अश्वत्थामा और शकुनि के साथ मिलकर चक्रव्यूह में निहत्थे (बिना शस्त्र वाला) और अकेले अर्जुनपुत्र अभिमन्यु की हत्या कर देते है। युद्ध के १४ वे दिन कर्ण इन्द्र के दिए अस्त्र का प्रयोग कर कौरव सैन्य का नाश कर रहे भीमपुत्र घटोत्कच का वध कर देते है। युद्ध के १५ वे और १६ वे दिन को कर्ण युधिष्ठिर, भीम, सहदेव और नकुल से युद्ध कर उनको परास्त कर जीवतदान देते है। 

कर्ण की मृत्यु के कारक

युद्ध के १७ वे दिन कर्ण और अर्जुन के बिच महायुद्ध प्रारम्भ होता है। कर्ण और अर्जुन अपने सभी दिव्य अस्त्र शस्त्र का एक दूसरे पर प्रयोग करते है। धरतीमाता के दिए श्राप के अनुसार कर्ण के रथ का पहिया धरती में फंस जाता है। तब वो अपने सारथि बने महाराज शल्य को रथ का पहिया निकालने को बोलता है, तब महाराज शल्य मना कर देते है। फिर अंगराज कर्ण स्वयं रथ का पहिया निकालने के लिए रथ से निचे आते है और भगवान परशुराम का दिया हुआ धनुष रथ पर ही छोड़ देते है। जब कर्ण रथ का पहिया निकालने का प्रयास कर रहा होता है तब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण का वध करने के लिए कहते है, तब कर्ण अर्जुन को धर्म पालन करके कुछ देर बाण न चलाने के लिए कहता है। श्रीकृष्ण तब अर्जुन को धुत सभा में कर्ण द्वारा द्रौपदी का वैश्या कहकर अपमान करने वाली बात स्मरण कराते है। युद्ध में स्वयं कर्ण द्वारा धर्म का पालन न करके निहत्थे और अकेले अभिमन्यु की हत्या करने की बात भी स्मरण कराते है और कहते है की कर्ण को धर्म की बाते करने का कोई अधिकार नहीं है। तब, अर्जुन ने एक दिव्य अस्त्र का उपयोग करके कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया। कर्ण के शरीर के भूमि पर गिरने के बाद कर्ण के देह से एक दिव्य ज्योति निकली और सूर्य में जाकर समाहित हो गई। 

कर्ण के दिव्यगती को प्राप्त होने के बाद कुन्तीमाता पांडवो को कर्ण का सत्य बताते है और कहते है की कर्ण उन सबका ज्येष्ठ भाई था। फिर कर्ण का अंतिम संस्कार के लिए युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों तैयार होते है और दोनों कर्ण पर अपना अधिकार बताते है। तब श्रीकृष्ण कर्ण पर दुर्योधन का अधिकार है ये बात पांडवो को समजाते है और कहते है की दुर्योधन को कर्ण का अन्तिम संस्कार करने दिया जाए। 

कर्ण समस्त विश्व के योद्धाओ में महान योद्धा था। कर्ण को वो नहीं मिला जिसका वो स्वयं अधिकारी था, पर वो जीवनभर अपने अधिकारों के लिए लड़ता रहा और  जीवन भर दुखद जीवन जीता रहा। 

तो यह थी कर्ण  के बारे में कुछ जानकारी अगर आपको यह पोस्ट पसंद आयी है तो इसको शेयर करना ना भूले और कमेंट में आपके विचार बताये और हमारे सोशल मीडिया पर भी हमें फॉलो करे

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